08 अगस्त 2013

ऐसा भी एक दीवाना



आपने फिल्मी हीरो-हीरोइनों के बहुत सारे दीवाने देखे होंगे, लेकिन इस विदेशी दीवाने जैसा न देखा होगा और न ही सुना होगा। खुद को ईरान का बताने वाला अब्दुल शरीफ फिल्म अभिनेत्री पूजा भट्ट पर इस कदर फिदा है कि उनसे मिलने के लिए वह 19 साल पहले सरहद लांघ आया और पकड़ा गया, तब से जेल में सड़ रहा है।
पूजा भट्ट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अभिनेत्री से प्रोड्यूसर बनीं पूजा भट्ट की गिनती 90 के दशक में बालीवुड की सबसे हाट अभिनेत्री के तौर पर होती थी। 24 फरवरी, 1972 को जन्मी पूजा भट्ट भारतीय सिनेमा जगत के जाने माने निर्देशक महेश भट्ट की बेटी हैं। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान फिल्मों में ही लगा दिया।
17 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता महेश भट्ट निर्देशित डैडीसे अपने फिल्मी कॅरियर की शुरूआत की थी। इसके बाद दिल है कि मानता नहींमें एक रोमांटिक किरदार निभा उन्होंने अपने अभिनय की क्षमता को सबको दिखा ही दिया।
अपनी अनोखी संवाद अदायगी और चेहरे के भावों से पूजा भट्ट ने जल्द ही प्रशंसकों का बड़ा वर्ग तैयार कर लिया। सड़क और सर में उन्होंने अभिनय की नयी ऊंचाइयां छूईं। कई बेहतरीन फिल्मों का हिस्सा बनने के बाद धीरे-धीरे पूजा भट्ट के फिल्मों की स्तरीयता कम होती गयी और वे शीर्ष की अभिनेत्रियों में अपना नाम शामिल कराने में असफल रहीं।
पूजा भट्ट की ही एक फिल्म है सड़क 3 दिसम्बर 1991 को रिलीज फिल्म सड़क को महेश भट्ट ने मार्टिन स्क्रोरसेस की टैक्सी ड्राइवरसे प्रेरित होकर बनाई थी। अपने समय में फिल्म सड़क ने जबरदस्त सफल पाई थी।
इस फिल्म में पूजा भट्ट ने जिस्मफरोशी के धंधे में फंसी एक लड़की का किरदार निभाया है। इस फिल्म के हीरो संजय दत्त एक टैक्सी ड्राडवर है और वह पूजा भट्ट से प्यार करते है। इस फिल्म में पूजा भट्ट ने अपना किरदार बखूबी निभाया है।
फिल्म देखने के बाद अब्दुल शरीफ का दिल अभिनेत्री पूजा भट्ट पर इतना आसक्त हुआ कि उसने फिल्मी हीरो-हीरोइनों के बहुत सारे दीवानों की होड़ में सबसे आगे निकल गया।
फिल्म सड़क में पूजा भट्ट का सेक्सी ग्लैमर देखकर अब्दुल शरीफ दीवाना हो गया और उसने पूजा भट्ट से मिलने की ठान ली। अपने मित्रों से जब उसने इस बात का जिक्र किया तो उसके किसी मित्रा ने उसे पूजा भट्ट का टेलीफोन नम्बर दे दिया।
टेलीफोन नम्बर लेकर लगभग 21 वर्षीय अब्दुल शरीफ पूजा भट्ट से मिलने निकल पड़ा। उस समय शायद उसे यह पता नहीं था कि एक देश से किसी दूसरे देश में प्रवेश के लिए पासपोर्ट व बीजा की भी आवश्यकता पड़ती है।
अपनी धुन में मग्न अब्दुल 1992 में ईरान से अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए बाघा बोर्डर पार कर वह भारत तक आ पहुंचा। लेकिन उसकी चाहत पूरी नहीं हो पाई और सेना के जवानों ने उसे पंजाब के गुरदासपुर जिले में पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया।
उसके पास जरूरी दस्तावेज न होने के कारण उसे 2 साल की कैद की सजा सुनाई गई और उसे जेल भेज दिया गया। हांलाकि उसके सजा की मियाद तो 1994 में ही पूरी हो चुकी थी, मगर तब तक वह अपनी याद्दाश्त खो चुका था। उसे उसके मुल्क भी नहीं भेजा जा सका, क्योंकि उसे खुद नहीं मालूम था कि वह कहां से आया है। कहां का रहने वाला है, उसके गांव का क्या नाम है। जेल अधिकारियों के पूछने पर वह कभी कहता है कि ईरान से आया है, तो कभी कहता है पाकिस्तान से।
जेल अधिकारियों के मुताबिक अब्दुल शरीफ को 18 जुलाई 1997 में अमृतसर सेन्ट्रल जेल में शिफ्ट किया गया था। तब से वह यहीं पर है। इससे पहले वह दो अन्य जेल में रह चुका है।  जेल उपाधीक्षक आरके शर्मा के अनुसार वह अभी भी पूजा भट्ट से मिलने चाहता है। वह पूजा के साथ फिल्म में काम भी करना चाहता है।
अब्दुल शरीफ की पूजा भट्ट के प्रति दीवानगी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उसने भारत आने के बाद अपने शरीर पर पूजा भट्ट का नाम गुदवाया। उसे पूजा भट्ट की फिल्मों के डायलाग भी आज भी याद हैं। साथी कैदियों को वह डायलाग सुनाता रहता है। इसके चलते वह साथी कैदियों और जेल स्टाफ के बीच काफी लोकप्रिय है।
फिलहाल इस समय अब्दुल शरीफ की उम्र 42 साल के आस-पास है। उसका कोई पैरवी करने वाला नहीं है। अमृतसर की सेंट्रेल जेल के सुप्रीटेडेंट अमरीक सिंह का कहना है कि अब्दुल शरीफ की रिहाई के लिए उन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय के जरिए पाकिस्तान की एम्बेसी और ईरान की एम्बेसी से उसके बारे में जानकारी मंगवाई, पर वहां के दूतावासों ने अब्दुल शरीफ को अपना यहां का नागरिक मानने से इन्कार कर दिया। इससे अब्दुल शरीफ की रिहाई का कोई आसार नहीं दिखाई पड़ रहा है।
29 जुलाई 2013 को अमृतसर की सेंट्रेल जेल में रोजा खोलने के समय जब मुस्लिम कैदियों को मिठाई, कपड़े आदि बांटे जा रहे थे तो अब्दुल भी लाइन में खड़ा हो गया। कहने लगा कि वह पूजा भट्ट के लिए पिछले 19 साल से रोजा रख रहा है। उसे पूरी उम्मीद है कि एक दिन पूजा ही जेल से उसे रिहा कराएंगी। नहीं तो उनकी याद में वह जेल की चारदीवारी में दम तोड़ देगा फिर एक गहरी सांस भरकर छोड़ी और सड़क फिल्म का गाना हम तेरे बिन कहीं रह नहीं पाते, तुम न होते तो हम मर जातेगुनगुनाने लगा।
अब देखना है कि उसकी यह दिवानगी आखिर क्या रंग लाती है? क्या वह पूजा भट्ट से मिल पाता है? यह तो भविष्य के गर्त में छिपा है।

05 अप्रैल 2013

इंसान नहीं भूत परोसते हैं भोजन

आपको ऐसे रेस्‍त्रां की सैर कराने जा रहे हैं, जिसमें प्रवेश करने के बाद लोग थर-थर कांपने लगते हैं। ऐसा माहौल जिसमें डर लगना तो पक्‍का है, क्‍योंकि इस रेस्‍त्रां में इंसान नहीं भूत भोजन परोसते हैं और भोजन लाशों के बीच में होता है। चौंकिये नहीं, असल में हम बात कर रहे हैं दुनिया के अजब गजब रेस्‍त्रां में शामिल स्‍पेन के ला मासिया एंकांटडा की।
इस रेस्‍त्रां का कॉनसेप्‍ट असल में इसके इतिहास से प्रेरित है। इतिहास- 17वीं सेंचुरी में जोसफ मा रिएस ने मासिया और सुरोका ने मासिया सेंटा रोज़ा बनवाया। लेकिन आगे चलकर संपत्ति पर पारिवारिक विवाद हो गया। एक दिन सुरोका और रिएस ने कार्ड उछाल कर अपनी किसमत तय की। रिएस सारी संपत्ति हार गये। उनके परिवार ने घर छोड़ दिया और परिवार ने नई संपत्ति खड़ी की। देखते ही देखते यह इमारत खंडहर में तब्‍दील हो गई।
दो सदियों तक वीरान पड़ी रही इमारत में सुरोका के वंशजों ने 1970 में एक रेस्‍त्रां बनाया। उनका परिवार  मानता था कि इस इमारत को कोई शाप लग गया है, लिहाजा वहीं से उनके दिमाग में बात आयी कि क्‍यों न रेस्‍त्रां को हॉन्‍टेड रेस्‍त्रां के रूप में चलाया जाये। बस तब से लेकर आज तक ये रेस्‍त्रां हॉन्‍टेड रेस्‍त्रां के रूप में चल रहा है।
और भी हैं अजब-गजब रेस्‍त्रां यहां पर भूतों के वेश में वेटर भोजन परोस्‍ते हैं और भोजन का समय निर्धारित है। निर्धारित समय पर जब ग्राहक पहुंचते हैं, तो उनका स्‍वागत खून से सने चाकू, तलवार या हसिये से किया जाता है। आगे बढ़ते ही पंजा, या नकली लाशें जो देखने में एकदम असली हैं, लटकी मिलती हैं। भोजन करते वक्‍त ग्राहकों के लिये एक शो का संचालन किया जाता है, जिसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं। 
इस रेस्‍त्रां की कुछ महत्‍वपूर्ण बातें 
 रेस्‍त्रां में तीन घंटे का भोजन
रेस्‍त्रां में एक शो तीन घंटे का होता है यानी आपका भोजन भी तीन घंटे तक चलता है। इसमें तरह-तरह के भूत-प्रेत के वेश में लोग आपका मनोरंजन करने के साथ-साथ कुछ अलग परोसने की कोशिश करते हैं, जिनसे आप निश्चित रूप से डर जायेंगे
दिल के मरीज व प्रगनेंट महिलाएं नहीं
इस रेस्‍त्रां में दिल के मरीजों, अस्‍थमा के मरीजों और प्रेगनेंट महिलाओं को भोजन करना मना है, क्‍योंकि डर के कारण दिल व अस्‍थमा के मरीजों की तबियत बिगड़ सकती है, वहीं गर्भ के अंदर बच्‍चे पर बुरा असर पड़ सकता है। साथ ही विकलांगों का प्रवेश भी वर्जित है।
14 साल से नीचे का प्रवेश प्रतिबंधित
इस रेस्‍त्रां में 14 साल से नीचे के बच्‍चों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि हॉरर शो से वो डर सकते हैं।
ग्राहक भी शो का हिस्‍सा
खास बात यह  है कि इस हॉरर शो में ग्राहक महज मूक दर्शक बनकर  नहीं बैठ सकता। वो दुख भी डरावनी कहानियों का हिस्‍सा बन जाते हैं, जिस वजह से डर तो लाजमी है।
जादूगर का जादू
डराने के लिये जरूरी है, कि कुछ ऐसा हो, जो विस्‍मयकारी लगे, लिहाजा यहां जादूगर का जादू भी प्रस्‍तुत किया जाता है, जो पूरी तरह हॉन्‍टेड होता है।
प्रवेश करते ही शुरू होता है शो
इस रेस्‍त्रां में बुकिंग करते वक्‍त ही आपको समय दे दिया जाता है। खास बात यह है कि जैसे ही आप रेस्‍त्रां में प्रवेश करेंगे, वैसे ही शो शुरू हो जायेगा जो डराने के लिये काफी है। रेस्‍त्रां में मोबाइल लेजाना मना है।
रेस्‍त्रां में 60 सीटें
रेस्‍त्रां में कुल 60 सीटें हैं, लेकिन शो तभी आयोजित किया जाता है, जब कम से कम 35 लोग डिनर या लंच करने आयें। रेस्‍त्रां में प्रवेश बुकिंग के आधार पर ही दिया जाता है। रेस्‍त्रां की टेबल-चेयर व इंटीरियर इस तरह बनाया गया है, जैसे कोई भूतों का अड्डा हो।
भूतों के वेश में वेटर
यहां पर भूतों के वेश में वेटर भोजन परोस्‍ते हैं और भोजन का समय निर्धारित है। निर्धारित समय पर जब ग्राहक पहुंचते हैं, तो उनका स्‍वागत खून से सने चाकू, तलवार या हसिये से किया जाता है।
लाशों के बीच भोजन
आगे बढ़ते ही पंजा, या नकली लाशें जो देखने में एकदम असली हैं, लटकी मिलती हैं। भोजन करते वक्‍त ग्राहकों के लिये एक शो का संचालन किया जाता है, जिसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं। 
साभार







'भूतों-प्रेतों की अनोखी अदालत'


आर्डर, आर्डर, आर्डर...  मनोज वल्द लाल्ता प्रसाद निवासी मदनपट्टी हाजिर होssssss। अमरेश हाजिर होssssss। सीता हाजिर होssssss। यह अदृश्य पुकार मीरजापुर जनपद में मीरजापुर-सोनभद्र मार्ग पर स्थित बीएचयू दक्षिणी परिसर के पास बलहरा ग्राम स्थित मोहन बरम बाबा के धाम में आते ही इंसान झुमने लगते हैं। यह आवाज़ नवरात्र में लगातार गूंजती रहती है। जी हां, यहां लगती भूतों की अदालत लगती है। ऐसा माना जाता है कि
बरम बाबा की अदालत में हाजिरी लगाने के लिए आने वालों को न्याय जरुर मिलता है। पुजारी पंडित राम नारायण दुबे ने बताया कि प्राचीन समय से लोग चौरी पर आते हैं। खुद राहत महसूस करते हैं। दूसरे पुजारी रमाकांत बताते हैं कि बाबा के दर पर हाजिरी लगाते ही शुरू हो जाती है भूतों की अदालत। इसमें तमाम
जनपदों से लोग आते हैं। उनके साथ आते है भूत, जो बाबा की चौरी के पास पहुंचते ही खेलने लगते हैं। पुजारी रमाकांत बताते हैं कि मामूली भूत तो बाबा की अदालत में आने के बाद मामूली फटकार से ही कान पकड़कर उठक बैठक कर भाग जाते हैं।
पंडित राम नारायण दुबे बताते हैं कि इन्सान के साथ रहकर शातिर बन चुके भूतों को कठोर दंड दिया जाता है। चौरी के पास बने कुण्ड में भूतों को बाबा के दंडाधिकारी सबक सिखाते है। जब तक वह तौबा नही कर लेता उसको इस कदर सबक सिखाया जाता है कि उसे अंतत: भागना ही पड़ता है।
सियालदह से आये केल्टू घोष ने बताया की मेरी बहन को मानसिक बीमारी है काफी इलाज कराया ठीक नहीं हुई इसलिए इस बार इस दरबार में आया हु बड़ा नाम सुना था इलाज के बाद हो कुछ बता पाउँगा।
बिहार से आये विमल यादव बताते हैं कि उनकी पत्नी को रह-रह कर दौरा पड़ता है। लोगों ने यहाँ के बारे में बताया है की नवरात्र में मेला लगता है तो अपनी पत्नी को लेकर आया हूं।
बिहार से आये विमल यादव बताते हैं कि उनकी पत्नी को रह-रह कर दौरा पड़ता है। लोगों ने यहाँ के बारे में बताया है की नवरात्र में मेला लगता है तो अपनी पत्नी को लेकर आया हूं।
यही नहीं बलिया से आयी मुन्नी देवी को इतना विश्वास है कि उनकी बेटी एक साल पहले यहाँ आई थी नवरात्र में अब वो बहुत हद तक ठीक हो गयी है। उसके ऊपर का प्रेत भाग गया है। अदालत में पुराने जटिल मामलों का त्वरित निस्तारण किये जाने से फरियादियों की तादात में नवरात्र में जबरदस्त इजाफा हो रहा है।
सूचना क्रांति के दौर में लोग भले ही अन्तरिक्ष चाँद सितारों पर घर बसाने की सोच रहे हों, लेकिन अन्धविश्वाश अभी भी पीछा नहीं छोड़ रहा है। आज भी भूतों की अदालत लगती है जहां हर नवरात्र में आने के बाद कई लोग राहत महसूस करते है। समाज का एक तबका रोगो से लड़ने में अपने आप को हताश पाकर इस अदालत से राहत महसूस करता है।
बीएचयू के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा संजय गुप्ता ने बताया कि मैंने ऐसे जगहों पर दौरा किया है दरसल हमारा विज्ञान गांवों तक नहीं पंहुचा है जिसका नतीजा है कि लोग ऐसे कल्चर पर विस्वास करते है।  डा संजय के मुताबिक, ऐसे स्थित में ये लोग बीमारी को प्रेत समझते हैं और निदान ऐसे जगहों पर ढूंढते है।
ऐसे में मरीज का माइन्ड सेट हो जाता है वो इन जगहों पर पहुंचते ही खेलने लगते हैं। बॉडी इतना मूवमेंट करती है कि थक कर गिर जाते हैं। लोग समझते हैं कि दुष्ट आत्मा निकल गयी। ऐसे जगहों पर रिसर्च की जरुरत है जहा ऐसे लोग इकठ्ठा होते है। इस तरह की बिमारियों की साइकोसिस कहते हैं।
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02 अप्रैल 2013

रूहों और पिशाचों का निवास

भूत-प्रेत में विश्वास ना करने वालों के लिए ये खबर चौंकाने वाली हो सकती है। आपने प्रेतआत्माओं के बारे में सुना ही होगा। इनके बसेरों के बारे में भी सुना होगा या फिल्मों में देखा
होगा। वैसे तो दुनिया में रहस्य और डर से जुड़ी घटनाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन यहां हम आपको दुनिया की ऐसी खौफनाक जगहों पर ले जाने वाले हैं जो किसी फिल्मी कहानियों से एकदम अलग बिल्कुल सच के करीब है। इनकी सच्चाई जानेंगे तो आपकी रूह तक कांप जाएंगी, असल में ये जगहें रूहों और पिशाचों का निवास स्थान हैं। कमजोर दिल वालें, कृपया इसे ना पढ़े..
बेरी पोमेरॉय का महल (टॉटनेस)
इस महल से जुड़ी कई कहावतें और कहानियां लोगों में प्रचलित है। इसका संबंध 14वीं सदी से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां दो बहुत लोकप्रिय महिलाओं, सफेद औरत और नीली औरत की आत्मा घूमती है। सफेद औरत का नाम मार्ग्रेट पोमेरॉय बताया जाता है। कहा जाता है कि मार्ग्रेट की बहन उससे बहुत इर्ष्या करती थी। इसी इर्ष्या के कारण एक दिन उसने मार्ग्रेट को कैद कर दिया। कैद और भूख के कारण मार्ग्रेट की वहीं मौत हो गई।
वहीं नीली औरत कौन है यह अभी तक एक रहस्य है। अभी तक किसी को पता नहीं चल पाया है कि वह कौन है। लेकिन कहा जाता है कि जो भी इंसान उस नीली औरत के पीछे जाता है, वह कभी लौटकर वापस नहीं आया।
एडिनबर्ग का महल (स्कॉटलैंड)
प्राचीनकाल के इस महल के बारे में प्रचलित कहानियां भी बेहद भयानक हैं। देखने में यह महल बहुत खूबसूरत और आकर्षक है लेकिन इस सुंदरता के बीच मर चुके लोगों की खौफनाक डरावनी आवाजें और चीखें आती रहती हैं। कहा जाता है कि प्लेग और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के समय मरे लोगों की आत्माएं यहां घूमती रहती हैं। कई लोगों क मानना है कि यहां कुत्तों की आत्माएं भी भटकती रहती हैं।
डोमिनिकन हिल (फिलिपींस)
इस भूतिया जगह पर दरवाजों को जोर-जोर से खटखटाने की खौफनाक आवाजें सुनाई देती हैं। बर्तनों को तोड़ना और अजीब तरह से चिल्लाने की आवाजें भी सुनाई देती रहती हैं जो यहां आत्माओं की पुष्टि करता है।
यहां के बारे में लोगों का मानना है कि युद्ध के समय कई लोग यहां मारे गए थे, उनकी आत्माएं यहां घूमती रहती हैं। कहा जाता है कि वे घायल सैनिक या मरीज जो युद्ध में घायल होने के बाद जीना चाहते थे लेकिन उनकी दर्दनाक मौत हो गई, वह आज भी इस जगह पर भटकते रहते हैं।
मोंट क्रिस्टो (ऑस्ट्रेलिया)
ऑस्ट्रेलिया का यह स्थान बेहद खतरनाक माना जाता है। लोगों का मानना है कि यहां एक महिला की आत्मा भटकती रहती है। पति के मृत्यु के बाद मिसेज क्रॉली नामक यह महिला 23 साल में सिर्फ दो ही बार अपने घर से बाहर निकली। इस भूतनी के बारे में कहा जा है कि आज यह अपने घर में किसी को भी घुसने नहीं देती है। खासकर अपने कमरे में वह हमेशा अपनी मौजूदगी दर्ज करवाती रहती है।
कुछ लोगों का इस बारे में कहना है कि जैसे ही वह जैसे ही उस कमरे में गए उनकी सांस अपने आप बंद होने लगी। लेकिन कमरे से बाहर आने पर उनका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक हो गया। लाइट का अपने आप जलना और बंद हो जाना इस मकान की एक और खास निशानी है।
एनशेंट रैम इन (इंगलैंड)
कब्रिस्तान के ऊपर बनी यह इमारत, कहा जाता है कि पूरी तरह आत्माओं के कब्जे में है। यहां हमेशा ही अजीब सी आवाजें सुनाई देती रहती हैं। इस घर में भयानक बदबू के साथ-साथ असाधारण वस्तुएं भी मिलती रहती हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां हत्याएं होती थीं और बच्चों की भी बलि दी जाती थी।
हाइगेट सिमिट्री (लंदन)
यह स्थान लंदन का सबसे कुख्यात भूतहा जगह है। कहा जाता है कि यहां सर कटी आत्माएं घूमती हैं। वैसे, यह एक बहुत ही सुंदर और आकर्षक जगह है। लेकिन शाम ढ़लते ही यहां दूर दूर तक कोई नजर नहीं आता। यहां आने वाले लोग इसकी कलाकारी के भी कायल हो जाते हैं। इस जगह की खासियत यह भी है कि दुनिया को अर्थशास्त्र का ज्ञान देने वाले महान विचारक कार्ल मार्क्स को भी यहीं दफनाया गया था।
ओहिओ यूनिवर्सिटी (अमेरिका)
अमेरिका के ओहिओ यूनिवर्सिटी के ज्यादातर परिसर हांटेड माने जाते हैं। ब्रिटिश सोसाइटी फॉर फिजिकल रिसर्च का कहना है कि ओहिओ यूनिवर्सिटी दुनिया के सबसे हॉरर जगहों में से एक है। यहां के बार में कहा जाता है कि यहां का विल्सन हॉल एक लड़की, जिसे सब चुड़ैल मानते थे, के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ। वह लड़की अपने खून से इस हॉल की दीवारों पर असाधारण और रहस्यमयी कहानियां लिखने के बाद मर गई।
वहीं वॉशिंगटन हॉल के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां उन खिलाड़ियों की आत्माएं घूमती हैं जो एक हादसे में मारे गए थे। कभी-कभी लोगों को यहां बास्केटबॉल खेलने आवाजें भी सुनाई देती हैं।
स्क्रीमिंग टनल (ओंटारियो)
स्क्रीमिंग टनल का रहस्य नियाग्रा फॉल्स(जलप्रपात) से संबंधित सभी कहानियों में सबसे ज्यादा भयानक मानी जाती है। यह टनल नियाग्रा फॉल्स को टोरंटो से जोड़ती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस टनल में एक जलती हुई लड़की की आत्मा भटकती रहती है। कहा जाता है कि रात के समय वह इस टनल में बैठती है और माचिस से खुद को जलाकर पूरी रात चिल्लाती है।

28 मार्च 2013

'मौत का त्रिकोण'

संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण पूर्वी अटलांटिक महासागर के अक्षांश 25 डिग्री से 45 डिग्री उत्तर तथा देशांतर 55 से 85 डिग्री के बीच फैले 39,00,000 वर्ग किमी के बीच फैली जगह, जोकि एक काल्पनिक त्रिकोण जैसी दिखती है, बरमूडा त्रिकोण अथवा बरमूडा त्रिभुज के नाम से जानी जाती है।
इस त्रिकोण के तीन कोने बरमूडा, मियामी तथा सेन जआनार, पुतौरिका को स्पर्श करते हैं। वर्ष 1854 से इस क्षेत्र में कुछ ऐसी घटनाऍं/दुर्घटनाऍं घटित होती रही हैं कि इसे 'मौत के त्रिकोण' के नाम से जाना जाता है।
बरमूडा त्रिकोण पहली बार विश्व स्तर पर उस समय चर्चा में आया, जब 1964 में आरगोसी नामक पत्रिका में इस पर लेख प्रकाशित हुआ। इस लेख को विसेंट एच गोडिस ने लिखा था। इसके बाद से लगातार सम्पूर्ण विश्व में इस पर इतना कुछ लिखा गया कि 1973 में एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में भी इसे जगह मिल गई।
बरमूडा त्रिकोण की सबसे विख्यात दुर्घटना 5 सितम्बर 1945 में हुई, जिसमें पॉंच तारपीडो यान नष्ट हो गये थे। उन उड़ानों का नेतृत्व कर रहे चालक ने दुर्घटना होने के पहले अपना संदेश देते हुए कहा था- हम नहीं जानते कि पश्चिम किस दिशा में है। सब कुछ गलत हो गया है। हमें कोई भी दिशा समझ में नहीं आ रही है। हमें अपने अड्डे से 225 मील उत्तर पूर्व में होना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि !
और उसके बाद आवाज आनी बंद हो गई। उन यानों का पता लगाने के लिए तुरंत ही मैरिनर फ्लाइंग बोट भेजी गई थी, जिसमें 13 लाग सवार थे। लेकिन वह बोट भी कहँ गई, इसका भी पता नहीं चला।
इस तरह की तमाम घटनाएँ उस क्षेत्र में होने का दावा समय समय पर किया जाता रहा है। लेकिन यह सब किन कारणों से हो रहा है, यह कोई भी बताने में अस्मर्थ रहा है। इस सम्बंध में चार्ल्स बर्लिट्ज ने 1974 में अपनी एक पुस्तक के द्वारा इस रहस्य की पर्तों को खोजने का दावा किया था। उसने अपनी पुस्तक 'दा बरमूडा ट्राइएंगिल मिस्ट्री साल्व्ड' में लिखा था कि यह घटना जैसी बताई जाती है, वैसी है नही। बॉम्बर जहाजों के पायलट अनुभवी नहीं थे। चार्ल्स के अनुसार वे सभी चालक उस क्षेत्र से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे और सम्भवत: उनके दिशा सूचक यंत्र में खराबी होने के कारण खराब मौसम में एक दूसरे से टकरा कर नष्ट हो गये।
बहरहाल समय-समय पर इस तरह के ताम दावे इस त्रिकोण के रहस्य को सुलझाने के किए जाते रहे हैं। कुछ रसायन शास्त्रियों क मत है कि उस क्षेत्र में 'मीथेन हाइड्रेट' नामक रसायन इन दुर्घटनाओं का कारण है। समुद्र में बनने वाला यह हाइड्राइट जब अचानक ही फटता है, तो अपने आसपास के सभी जहाजों को चपेट में ले सकता है। यदि इसका क्षेत्रफल काफी बड़ा हो, तो यह बड़े से बड़े जहाज को डुबो भी सकता है।
वैज्ञानिकों का मत है कि हाइड्राइट के विस्फोट के कारण डूबा हुआ जहाज जब समुद्र की अतल गहराई में समा जाता है, तो वहाँ पर बनने वाले हाइड्राइट की तलछट के नीचे दबकर गायब हो जाता है। यही कारण है कि इस तरह से गायब हुए जहाजों का बाद में कोई पता-निशां नहीं मिलता। इस क्षेत्र में होने वाले वायुयानों की दुर्घटना के सम्बंध में वैज्ञानिकों का मत है कि इसी प्रकार जब मीथेन बड़ी मात्रा में वायुमण्डल में फैलती है, तो उसके क्षेत्र में आने वाले यान का मीथेन की सांद्रता के कारण इंजन में ऑक्सीजन का अभाव हो जाने से वह बंद हो जाता है। ऐसी दशा में विमान पर चालक का नियंत्रण समाप्त हो जाता है और वह समुद्र के पेट में समा जाता है। अमेरिकी भौगोलिक सवेक्षण के अनुसार बरमूडा की समुद्र तलहटी में मीथेन का अकूत भण्डार भरा हुआ है। यही वजह है कि वहाँ पर जब-तब इस तरह की दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।
बहरहाल इस तर्क से भी सभी वैज्ञानिक सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि बरमूडा त्रिकोण अभी भी एक अनसुलझा रहस्य ही बना हुआ है। इस रहस्य से कभी पूरी तरह से पर्दा हटेगा, यह कहना मुश्किल है।

बरमूडा त्रिकोण क्षेत्र में जमीन पर हुई घटनाएं
  1. सन् 1969 में बिमिनी, बाहामास स्थित ग्रेट आइजैक लाइटहाउस पर कार्यरत दो कर्मचारी अचानक लापता हो गये और फिर कभी नहीं मिले।
 बरमूडा त्रिकोण की समुद्री घटनाएं
  1. 4 मार्च 1918: पानी में चलनेवाला अमेरिकी जहाज साइक्लॉप्स, 309 लोगों के साथ गायब हो गया।
  2. 1 दिसंबर 1925: चाल्र्सटन, दक्षिण कैरोलीना से हवाना, क्यूबा के लिए चलने के बाद पानी के जहाज सोटोपैक्सी ने रेडियो सिगल पर संदेश जारी किया कि जहाज डूब रहा है। उसके बाद जहाज की कोई खबर नहीं मिली।
  3. 23 नवंबर 1941: अमेरिकी जहाज प्रोटिअस, 58 लोगों के साथ वर्जिन आइलैंड के लिए चला. इस पर बॉक्साइट लदा हुआ था। दो दिनों बाद इसका कोई पता नहीं चला। इसके अगले महीने उसी कंपनी का दूसरा जहाज नेरेअस 61 लोगों के साथ उसी क्षेत्र के आसपास से लापता हो गया।
  4. 2 फरवरी 1963: सल्फर क्वीन नामक जहाज 15 हजार दो सौ 60 टन सल्फर के साथ ब्यूमोंट, टेक्सास के लिए चला। इस पर चालक दल के 39 सदस्यसवार थे। 4 फरवरी को प्राप्त रेडियो सिग्नलों के अनुसार, यह तेज समुद्री आंधी में फंस गया और इसके दो दिन बाद इसकी कोई खोज-खबर नहीं मिली।
बरमूडा त्रिकोण की वायुयान दुर्घटनाएं
  1. 5 दिसंबर 1945: फ्लाइट 19 में सवार 14 वायु सैनिकों का एक दल लापता हुआ, उसी दिन उसकी तलाश में 13 सदस्यों के साथ निकला पीबीएम मरीनर भी लापता हुआ।
  2. 30 जनवरी 1948: स्टार टाइगर नामक हवाई जहाज चालक दल के छह सदस्यों और 25 यात्रियों के साथ लापता हो गया।
  3. 28 दिसंबर 1948: डगलस डीसी-3 हवाई जहाज चालक दल के तीन सदस्यों और 36 यात्रियों के साथ लापता हुआ।
  4. 17 जनवरी 1949: स्टार एरियल वायुयान चालक दल के सात सदस्यों और 13 यात्रियों के साथ लापता हो गया।

प्रेम दिवानी नागिन

यह न तो किसी फिल्म की कहानी है और न ही कोई किस्सा। लेकिन जिस किसी ने इस अजीब दास्तान को सुना वही इसे देखने के लिए भागा चला आया। जहां मायावादी जमाने में आदमी ही आदमी का दुश्मन है वहीं जानवरों व पशु पक्षियों में एक दूसरे के लिए स्नेह भरा हुआ है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण इस मामले में नजर आ रहा है। नाग और नागिन की इस प्रेम कहानी को जिसने भी अपनी आंखों से देखा तो विश्वास नहीं कर सका। ड्रेन के गड्ढे में दो फुट का नाग मरा पड़ा था और उसके मृत शरीर से लिपटी थी नागिन। वह दो दिन से नाग की देह के पास उसकी मौत पर विलाप कर रही है। मिट्टी के रंग की नागिन नाग के शरीर के पास फन फैला कर बैठ गई। वह कभी वहां चक्कर लगाती तो कभी उसके शरीर से लिपट जाती। जब नाग को छेड़ा जाता तो वह फन उठा कर विरोध जताती। जिसने भी इस घटना को सुना वह मौके पर पहुंच गया। देखते ही देखते वहां महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। लोगों का प्रयास था कि नागिन को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे और वह पास के जंगल में चली जाए। इसके बाद में वे मृत नाग को दफन कर देंगे। लेकिन अगर अब वे नागिन के रहते ओअह नाग को हटाते हैं तो नागिन उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है। 

यह घटना पंजाब में कैथल की है। पहली नजर में देखने पर लगता है कि दो सांप मरे पड़े हैं। नाग की लाश पर नागिन इस तरह चिपकी हुई कि उसके जिंदा रहने का एहसास नहीं हो रहा था। जब नाग को हिलाया गया तो नागिन ने गुस्से में अपना फन उठाया। इसके बाद वह नाग के चारों तरफ चक्कर लगा कर फिर उसी जगह आकर नाग के शरीर से लिपट गई। जब लोगों ने ये घटना देखा तो किताबों में पढ़ा व सुना अंधविश्वास फिर से जन्म लेने लगा। शनिवार को रूपनगर के रहने वाले एक युवक ने बताया कि किसी ने नाग को मार कर वहां फेंक दिया था। उसने पास में ही गड्ढा खोद कर उसे दफनाने का सोची। अमित कुमार, रणधीर व नरेश कुमार ने बताया कि नवरात्रों में नाग के इस तरह पड़े रहने को अशुभ समझा जाता है। गड्ढा खोदने के बाद लाठी से जैसे ही वे मृतक नाग को उठाने लगे तो उन्हें उसकी देह से लिपटी नागिन का अहसास हुआ। नाग को हिलाने से उसने क्रोध में फन उठाया तो युवक पीछे हट गए।

इस विषय में एक जीव विज्ञान प्रोफेसर का मत है कि नाग ऋतु क्रिया के समय गंध निकालते हैं। नागिन नाग से गंध मिलने के बाद उससे मेल करने के लिए नाग की खोज में चल पड़ती है। इसी बीच किसी ने नाग को मार दिया। जब वह उसके पास पहुंची तो प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी। नाग मर चुका है वह कोई हरकत नहीं करेगा। नागिन को जब गंध मिलनी बंद हो जाएगी तो वह अपने आप चली जाएगी। इस मौसम में नाग शीत निद्रा में जाने के प्रयास में होते है। आमतौर पर नाग वर्षा ऋतु में ही प्रजनन करते हैं। लेकिन कभी-कभी शीत ऋतु से पहले भी नाग क्रिया करते हैं।
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आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खुल्लमखुल्ला खेल

आज जहां वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति वाले कण की खोज कर भगवान के करीब पहुंच चुके हैं, वहीं पश्चिम चंपारण जिले के वाल्मीकि नगर स्टेशन के समीप गोबरहिया गांव में एक बाबा द्वारा भूतों का मेला लगाकर आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खुल्लमखुल्ला खेल खेला जा रहा है। यह मेला प्रत्येक माह पूर्णिमा के दिन लगता है। इस मेले में नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों से हजारों की संख्या में पीड़ित महिलाएं आकर बाबा के दरबार में दुआ की भीख मांगती हैं।
आस्था के नाम पर लगने वाले इस मेले में आने वाले पीड़ितों की फेहरिस्त हर बार लंबी होती जाती है। पीड़ित महिलाओं की झाड़-फूंक के बाद भूत भगाने के लिए बाबा द्वारा पेड़ में कील ठोंककर बांध दिया जाता है। वाल्मीकि नगर व्याघ्र परियोजना के अधीनस्थ गोबरहिया गांव में चार वर्ष पूर्व मिट्टी की पीड़िया बनाकर एक पीपल के पेड़ के नीचे पूजा शुरू हुई थी। धीरे-धीरे अंधविश्वास का जाल फैलता गया और धर्म के नाम पर भूतों से निजात दिलाने का ठेका इस बाबा ने ले लिया।
बाबा कैसे करते हैं पीड़ितों का इलाज
पूर्णिमा के एक दिन पहले हजारों की संख्या में महिलाएं मेला में पहुंच जाती हैं। अगले दिन अल सुबह गांव के समीप स्थित एक तालाब में स्नान करती हैं, उसके बाद पीपल के पेड़ के नीचे कतारबद्ध होकर वहां गाड़े गये ध्वजा की तरफ ध्यान लगाकर बैठ जाती हैं। इसी बीच पुजारी हरेन्द्र दास उर्फ लालका बाबा आते हैं और लाइन में बैठी पीड़िताओं को एक कुआं से जल निकालकर पीने के लिए देते हैं। जल पीने के बाद महिलाओं पर भूत का नशा सवार हो जाता है। इसके बाद वे झूमने और तरह-तरह की हरकतें शुरू कर देती हैं।
पीड़ित महिलाएं जमीन पर हाथ-पैर पटक-पटक कर चिल्लाने लगती हैं, वहीं अपने सिर को हिला-हिलाकर गीत गाने लगती हैं। इस क्रम में उनके खुले बाल और चेहरे को देखकर ऐसा लगता है कि मानो भूत इन महिलाओं पर सवार हो गया है। बाबा कुछ देर बाद महिलाओं को फिर जल पिलाते हैं। इसके बाद वे थोड़ी देर के लिए शांत पड़ जाती हैं। फिर देर रात झांड़-फूंक के बाद बाबा के द्वारा पीपल के पेड़ में एक-एक कील ठोंककर यह कहा जाता है कि तीन बार यहां आने के बाद भूत खुद ही भाग जाएगा।
अय्याशी भी करते हैं बाबा
मेले में आने वाली महिलाओं के साथ बाबा द्वारा अय्याशी करने की भी सूचना है। बाबा संभ्रांत परिवार की वैसी महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं, जिन्हें बेटा नहीं हो रहा हो या फिर शादी के बाद उनका पति परदेश चला गया हो। हालांकि, इस बात की कहीं से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन बाबा की अय्याशी स्थानीय लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई है। बहरहाल, विज्ञान के नित्य नये खोजों के बीच अंधविश्वास के प्रति बढ़ रहा आस्था का यह खेल कई सवालों को जन्म दे रहा है।

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अकबर और वीरबल का मिलन

अकबर को वीरबल कैसे मिले, इसके बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन उनमें कोई भी पूर्णतः विश्वसनीय नहीं है। इस बारे में जो कथा सबसे अधिक विश्वसनीय प्रतीत होती है, वह यहाँ दे रहा हूँ।
कहा जाता है कि वीरबल आगरा में किले के बाहर पान की दुकान करते थे। उस समय उनका नाम महेश था। एक बार बादशाह अकबर का एक नौकर उनके पास आया और बोला- ‘लाला, आपके पास एक पाव चूना होगा?’ यह सुनकर वीरबल चौंक गये और पूछा- ‘क्या करोगे एक पाव चूने का? इतने चूने की जरूरत कैसे पड़ गयी तुम्हें?’
वह बोला- ‘मुझे तो कोई जरूरत नहीं है, पर बादशाह ने मँगवाया है।’
वीरबल ने पूछा- ‘बादशाह ने मँगवाया है? जरा तफसील से बताओ कि क्यों मँगवाया है?’
वह बोला- ‘यह तो पता नहीं कि क्यों मँगवाया है। पर आज मैं रोज की तरह बादशाह के लिए पान लगाकर ले गया था। उसको मुँह में रखने के बाद उन्होंने पूछा कि तुम्हारे पास एक पाव चूना होगा? मैंने कहा कि है तो नहीं, लेकिन मिल जाएगा। तो बादशाह ने हुक्म दिया कि जाकर ले आओ। बस इतनी सी बात हुई है।’
‘तो मियाँ अपने साथ अपना कफन भी लेते जाना।’
यह सुनते ही वह नौकर घबड़ा गया- ‘क्.. क्.. क्या कह रहे हो, लाला? कफन क्यों?’
‘यह चूना तुम्हें खाने का हुक्म दिया जाएगा।’
‘क्यों? मैंने क्या किया है?’
‘पान में चूना ज्यादा लग गया है। इसलिए उसकी तुर्शी से तुम्हें वाकिफ कराने की जरूरत महसूस हुई है।’
‘लेकिन इतना चूना खाने से तो मैं मर जाऊँगा।’
‘हाँ, तभी तो कह रहा हूँ कि कफन साथ लेते जाना।’
अब तो वह नौकर थर-थर काँपने लगा। रुआँसा होकर बोला- ‘लाला,जब आप इतनी बात समझ गये हो, तो बचने की कोई तरकीब भी बता दो।’
वीरबल ने कहा- ‘एक तरकीब है। बादशाह के पास जाने से पहले तुम गाय का एक सेर खालिश घी पी जाना। जब चूना खाने का हुक्म मिले, तो चुपचाप खा जाना और घर जाकर सो जाना। तुम्हें कुछ दस्त-वस्त लगेंगे, लेकिन जान बच जायेगी।’

वह शुक्रिया करके चला गया।
घी पीकर और चूना लेकर वह बादशाह के पास पहुँचा- ‘हुजूर, चूना हाजिर है।’
अकबर ने कहा- ‘ले आये चूना? इसे यहीं खा जाओ।’
‘जो हुक्म हुजूर’ कहकर वह चूना खा गया। अकबर ने हुक्म दिया- ‘अब जाओ।’ कोर्निश करके वह चला गया।
अगले दिन वह फिर पान लेकर हाजिर हुआ। उसे देखकर अकबर को आश्चर्य हुआ- ‘क्या तुम मरे नहीं?’
‘आपके फजल से जिन्दा हूँ, हुजूर!’
‘तुम बच कैसे गये? मैंने तो तुम्हें एक पाव चूना अपने सामने खिलाया था।’
‘हुजूर, आपके पास आने से पहले मैंने गाय का एक सेर घी पी लिया था।’
‘यह तरकीब तुम्हें किसने बतायी? और तुम्हें कैसे पता था कि मैं चूना खाने का हुक्म दूँगा?’
‘मुझे नहीं पता था, लेकिन पान वाला लाला समझ गया था। उसी ने मुझे यह तरकीब बतायी थी, हुजूर।’
अब तो अकबर चौंका। बोला- ‘पूरी बात बताओ कि तुम दोनों के बीच क्या बात हुई?’
तब उस नौकर ने वह बातचीत कह सुनायी जो उसके और वीरबल के बीच हुई थी। यह सुनकर अकबर के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। बोला- ‘यह पानवाला लाला तो बहुत बुद्धिमान मालूम होता है। तुम उसको हमारे पास लेकर आना। हम उसे अपना दोस्त बनायेंगे।’
तब वह नौकर वीरबल को लेकर अकबर के पास गया और इस प्रकार अकबर और वीरबल में मित्रता हुई।

Goa king

27 मार्च 2013

मां का आंचल



मां रेवा का आंचल आज भी पहले की तरह फैला हुआ था. नर्मदा प्रसाद भागते हुयें आया और धड़ाम से जाकर उसके आंचल में जा गिरा. मां रेवा ने अपना ममतामयी हाथ जब उसके सिर पर फेरा तो वह रो पड़ा. वह कुछ पुछना चाहता था लेकिन उसे जोर की भुख लगी थी. मां रेवा समझ चुकी थी कि उसका लाड़ला भुख से व्याकुल हो रहा है उसने उसके लिए भोजन की थाल परोस दी. भरपेट खाना खाकर वह फिर सो गया. वह ऐसा सोया कि अपने साथ लायें अनेक सवालों को वह भूल गया. जैसे ही भोर होने को आई कि उसे एक बार फिर मां रेवा ने नींद से जगाते हुयें कहा ‘ बेटा नर्मदा जरा उठ तो देख बेटा भोर होने वाली है. जा अपने मालिक के घर वहां उसके कोठे में बंधी पड़े गाय के बछड़े उनके छुटने का इंतजार कर रहे होगें …….! अगर तू नहीं गया तो वे बेचारे भुखे रह जायेगें ……..! सुन  बेटा नर्मदा उन्हे भी तेरी तरह उनकी मां से मिल कर अपनी भुख प्यास को शांत करना है……….. !
अधकचारी नीदं से अलसाय हुयें नर्मदा की बार तो इच्छा हुई कि वह मना कर दे ……… पर उसे तो जाना ही होगा क्योकि उसका मालिक बड़ा ही निर्दय और जालिम किस्म का है. वह जानता है कि एक दिन अगर कोठे से जानवर नहीं छुटेगें तो उसका मालिक उसे मार मार कर लहु लुहान कर देगा. वह डर के मारे उठ कर अपने मालिक के घर की ओर सरपट भागा. उसे आज इतनी जल्दी थी कि वह यह तक भूल गया कि वह यह तक भूल गया कि वह मां रेवा से आज क्या पुछने के लिए आया था.
पौराणिक कथाओं में सदियों से देवी देवताओं की आरध्य रही जगत तारणी पूण्य सलिला मां नर्मदा को रेवा भी कहा जाता है. इसी जग कल्याणकारी मां रेवा के किनारे बसे एक छोेटे से गांव में रहने वाला नर्मदा प्रसाद करीब बीस साल पहले आई बाढ़ में अपने माता – पिता के साथ बहते हुयें इसी गांव के गोपाल मछुआरे को मिला था. नर्मदा प्रसाद के माता -पिता पहले ही दम तोड़ चुके थे. उनकी बहती लाश के साथ नर्मदा प्रसाद भी मछली की तलाश में जाल बिछायें गोपाल के जाल में आकर उलछ गया. गोपाल ने उसे बाहर निकाल कर फेकना चाहा लेकिन उसे उस नन्हे सी जान के शरीर में हलचल होती दिखाई दी. गोपाल अपने मछली के जाल को वही छोड़ कर उस बच्चे को लेकर गांव की ओर सरपट भागा. कुछ दिनो तक चले गांव के वैद्य के इलाज के चलते नर्मदा प्रसाद बच गया लेकिन वैद्य ने गोपाल को चेताया कि इस बच्चे को नदी के पानी से बचायें रखना. पानी देख कर इस बच्चे का शरीर अपने आप हिचकोले मारने लगेगा.
इस रहस्य को गोपाल ने किसी को नही बताया. आज इस घटना को लगभग बीस साल हो गये. ना तो गोपाल उस रहस्य को जान पाया कि उसके बाबा उसे नदी के किनारे जाने से क्यो रोकते थे. नर्मदा कई बार अपने बाबा को बिना बताये एक रहस्य को आज तक छुपायें रखा था कि वह जब भी मां रेवा के किनारे बहती धारा को एकटक निहारता था तो उस बीच धार में एक महिला अपनी बांहे फैलाये उसे अपनी ओर बुलाती थी. जब वह उसकी ओर जाता था तो नदी में अपनी आप रास्ता बन कर निकल आता था. उसे वह महिला कई बार अपने हाथों से  नाना प्रकार के पकवान खिलाती थी तथा अपने ही आंचल में सुलाती थी. उसे जब तक वह इस रहस्य को समझ नहीं सका तब तक ऐसा होता था. लेकिन एक दिन उसे नदी की ओर जाता उसके बाबा ने देख लिया तो उसके बाबा ने उसे बहुॅंत डाटा फटकारा तब से वह नदी के किनारे नही जाता था.
नर्मदा यह नहीं जान सका था कि उसके बाबा उसे क्यों नदी की ओर जाने से रोकते थे तथा नदी कह बीच धारा में बाहे फैलाये उसको बुलाने वाली महिला कौन है. उस महिला से उसका क्या नाता है. नर्मदा के अपने माता – पिता कौन थे इस बारे में उसे कोई जानकारी नही थी. पर उसने गंाव वालों के मुह से सुना था कि बाबा उसके पिता नही है. आज उसके बाबा भी अब इस दुनिया में नहीं रहे. एक रात जब उसे अपने बाबा से जिद करके यह जानने की कोशिश की कि बाबा आप मुझे क्यों नदी के किनारे जाने से रोकते है. तब उसके बाबा ने कहा कि वह कल उसे उस राज को बता देगा जो कि बरसो से उसके दिल के किसी कोने मेे दबा पड़ा है. कल सुबहउठ कर वह अपने बाबा से उस रहस्य को जान पाता इसके पहले ही उसे सुबह उठ कर गंाव के जमींदार के कोठे पर जाकर गाय बछड़ो को छोडना था. अपने वादे के मुताबिक गोपाल उस राज को बताने के पूर्व ही उस दिन चल बसा.
गोपाल बाबा उसे नर्मदा प्रसाद कह कर पुकारते थे.  अपने के नाम के पीछे बाबा कहा करते थे कि बेटा तू मां कौन है ……..! किस जाति का है ………….!  किस गांव का है …………..! तेरे कौन रिश्तेदार है ……………? मैं नहीं जानता. तू मुझे मां नर्मदा की साठ साल की सेवा के बदले में मिला प्रसाद है इसलिए तू मेरा नर्मदा प्रसाद है………! गोपाल के मरने के बाद गंाव वालों ने इस एक बार फिर अनाथ हुयें नर्मदा प्रसाद के बारे में जांच पड़ताल की पर किसी को यह तक नही मालुम कि बाढ ़में बहता मिला यह बच्चा किसका था……? लगभग बीस साल पहले भी गांव वालों ने आसपास के गांवों तक मुनादी करवा दी थी कि जिसके भी परिवार के लोग बाढ़ में बह गयें हो वे आकर इस बच्चे के बारे में जानकारी देकर उसे ले जाना चाहे तो ले जा सकते है. लेकिन कोई नही आया तो गोपाल मछुआरे ने उसे अपने बेटे की तरह पाल पोश कर बड़ा किया था. गोपाल बाबा के मरने के बाद नर्मदा प्रसाद ने जमीदार के घर की नौकरी छोड़ दी वह अपने बाबा के पुश्तैनी काम को करने का बीड़ा उठा कर वह नही की ओर चला गया.
आज एक बार फिर मां रेवा में बाढ़ आई थी. उसका पानी हिलांेरे मार कर इस किनारे से उस किनारे तक अठखेलिया कर रहा था. नर्मदा प्रसाद को ऐसा लगा कि नदी की बीच धारा कोई महिला बाहें फैला कर उसे आंखों के छलकते आंसुओं से पुकार रही है. काफी देर तक उस महिला को अपनी ओर बाहें फैला कर पुकारते देख नर्मदा प्रसाद का शरीर हिचकोले मारने लगा. वह ऊफनती रेवा की बीच धारा में उसे पुकार रही महिला की ओर सरपट भागा. उसे पानी में भागते देख उसके संगी साथी गांव की ओर बद्हवाश से भागे. कुछ ही पल में पुरा गांव मां रेवा के किनारे जमा हो गया. गांव वाले शाम तक रहे पर किसी को भी नर्मदा का अता पता नही मिला तो गंाव वाले खाली हाथ वापस लौट कर आ गयें. गांव वाले कहने लगे बेचारा नर्मदा जहॉ से आया वहीं चला गया. नर्मदा के इस तरह नदी में बह जाने से पुरे गंाव में आज रात किसी के घर पर चुल्हा नही जला. सबके सब उदास थे. लोगो की आंखों के आंसु झर झर कर बह रहे थे. सारे गंाव वाले को आज ऐसा लग रहा था कि उसके परिवार का कोई सदस्य बह गया हो. आज की रात लोगो को पहाडत्र जैसी लग रही थी. कई लोगो ने तो रात भर सोच सोच कर काट ली. हर कोई नर्मदा को लेकर परेशान था.
खुले आसमान के चांद तारों को देख कर रात के पहर कटने के इंतजार करने वाले लोगो को जैसे ही भोर के होने की आहट हुई लोग अपने घरों से बाहर की ओर निकल पडें. हर कोई एक दुसरे की आंखों में झांक कर एक दुसरे को बताना चाह रहा था कि उसने इस काली अमावस्या जैसी रात को कैसे काटा है. गांव वाले अपने घरों से बाहर निकल कर रेवा के किनारे जाकर नर्मदा को तलाशते इसके पहले ही उन्हे रेवा के तट की ओर गंाव को आते रास्ते एक युवक आता हुआ दिखाई दिया. पास आने पर ऐसा लगा कि आने वाला कोई नही अपना नर्मदा है तो सारा गांव खुशी के मारे उसकी ओर दौड़ पड़ा.
नर्मदा को जिंदा देख कर गांव की महिलाआंे के अंाचल भर आयें. गांव वाले दिल धडकने लगे. नर्मदा को जिंदा देख कर सब के सब प्रसन्नचित थे वही हर छोटे बडें सबके चेहरे पर एक जिज्ञासा झलक रही थी कि नर्मदा तू रात भर कहॉ था………?  वह मंा रेवा की ऊफनती धारा की ओर क्यों भागा था…..!  उसके साथ क्या हुआ…….! नर्मदा ने इस तरह सारे गांव वालों  को अपनी ओर जिज्ञासा भरी निगाहों से देख तो वह कुछ पल के लिए डर गया. उसने डरते डरते गंाव वालों से पुछा  पुछा इतनी सुबह पुरा गंाव कहॉ जा रहा है……..? उसके सवालों को सुन कर केतकी आजी रो पड़ी उसने नर्मदा के सिर पर हाथ फेर कर कहा बेटा हम तुझे ही ढुढ़ने जा रहे थे…….! तू रात भर से घर नहीं आया था……..! कल तेरे साथ गयें कुछ लड़को ने तुझे ऊफनती रेवा की बीच धारा में भागते हुयें देखा तब से पुरा गांव परेशान है.
केतकी आजी के बताने पर कुछ याद आया.उसने बताया कि कल जब वह रेवा के किनारे मछली का जाल बिछाने गया था तब उसने देख कि नदी में बाढ़ आई थी. नदी की बीच धार में कोई महिला मुझे बांहे फैला कर अपनी ओर बुला रही है ………! मैं उसकी ओर भागा……. उसके बाद मुझे पता नही कि क्या हुआ………..? मुझे जब होश तब मैंने अपने आप को नदी के  दुसरे छोर पर पाया.मुझे आसपास चीखते सन्नाटे में समझ आया कि मैं जिस स्थान पर लेटा हू उसके आसपास कोई नदी बह रही है. दिमाग पर काफी जोर देने के बाद मुझे पता चला कि मैं जिस स्थान पर लेटा हुआ था उससे चार पांच फंलाग की दूरी पर मां रेवा बह रही है. मुझे डर लग रहा था मैं थर थर कर कांपते कांपते खुले आसमान में चन्द्रा के प्रकाश में उस भयावह चीखते सन्नाटे को चीरते हुयें नदी के किनारे आने के लिए निकल पड़ा . खुले आसमान में दिखने वाली चांदनी बता रही थी कि रात का तीसरा पहर बीत चुका है. चौथे पहर के शुरू होते ही मैंने अपने घर की ओर आने का मन बना कर मै जैसे नदी के किनारे आया तो मेरी सिटट्ी पिटट्ी गुम हो गई. कल की तरह आज भी मां रेवा पुरे उफान पर बह रही थी.चन्द्रमा के प्रकाश में साफ दिख रहा था कि मां रेवा नदी की धार में काफी बहाव था. नदी अपने अपने दोनो किनारों के उपर से बह रही थी. मुझे इस नदी पार करके गांव की ओर आना था. मुझे तो तैर कर नदी पार करना भी नहीं आता था. अब मेरे लिए नदी पार करके आना बड़ा ही कठीन काम था. मैं इसी उधेड़बुन में कुछ सोच रहा था कि मुझे ऐसे लगा कि कोई मेरा नाम लेकर पुकार रहा है.
मैने आसपास चारों ओर चन्द्रमा के प्रकाश में अपनी निगाहे घुमा कर देखा तो मुझे कोई भी दिखाई नहीं दिया. सुनसान इलाके में जब किसी ने मेरा नाम लेकर एक बार फिर किसी ने मुझे पुकारा तो घबरा गया. इस बार की आवाज किसी महिला की थी. मैं उस अपरिचित महिला की आवाज को पहचानने की कोशिस कर रहा था कि इतने में वह आवाज एक बार फिर मुझे सुनाई दी. वह अपरिचित आवाज मुझसे कह रही थी बेटा ‘ नर्मदा तू उस पार जाना चाहता है तो , नदी की बीच धार को पार करके चले आ. ’ मैं नदी के किनारे को छुती उसकी धार तक आने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहा था. ऐसे में किसी ने मेरी किसी अदृश्य परछाई ने मेरी बांह पकड़ी और मुझे नदी की धार तक ले आया. मैंने जैसे ही नदी में पांव रखा कि चमत्कार हो गया . नदी के बीचो बीच में एक पगडंडी निकल आई जिस पर मैं चलकर नदी के इस छोर से दुसरे छोर तक चला आया. मैने जैसे पलटकर देखा तो मां रेवा उसी गति से शोर मचाती बह रही थी. मैं नदी पार कर सीधा चला आ रहा हूॅं.
नर्मदा की बात को सुन कर गांव वालों का आश्चर्य का ठिकाना नही था. इतने साल से मां रेवा के किनारे रहते हो गयें लेकिन उन्हे आज तक मां रेवा ने कभी दर्शन तक नहीं दियें और इस लड़के की किस्मत तो देखियें कि यह उसकी गोद में खेल आया है. नर्मदा की बताई बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे पुरे गांव को जैसे लकवा मार गया. गांव वालों के लिए नर्मदा की बताई बाते किसी अनहोनी घटना से कम नही थी. पुरा गंाव नर्मदा की बातों को सुन कर नर्मदा मैया की जय जय कार करते नदी के किनारे की ओर दौड़ पड़ा.आज इस घटना को बीते कई साल हो गयें लेकिन गांव में अब भी मां रेवा के किनारे एक घास फुस की झोपड़ी बना कर रह रहा नर्मदा को विश्वास है कि वह एक बार अपनी अंतिम सांस मां रेवा के आंचल में ही लेगा. उसे हर पल इंतजार है कि कब मां रेवा उसे एक बार फिर पुकार कर कहे बेटा नर्मदा आ अब विश्राम कर ले.
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